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ग़ज़ल

अदा देखकर के

अगर दुनियादारी तू पहचान जाती

तो दीवार नफ़रत की बनने ना पाती

अमीरों की रस्मो-अदा देखकर के

ग़रीबी पे अब शर्म मुझको ना आती

वह ग़म के थे तोहफ़े जो देते रहे तुम

वह मेरी थी झोली वो भर कैसे पाती

मेरी धड़कनों में हर इक लफ्ज़ रौशन

जो लिखी थी तुमने लड़कपन में पाती

निगाहे-करम तुम जरा डाल देते

भंवर में ना कश्ती मेरी डगमगाती

मैं किरदार में खु़द को पाता हूं राजन

नया कि़स्सा हर रात नानी सुनाती


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