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ग़ज़ल

आने को है मयखा़ने

भटके हुए अंधेरों के दर पर भी मिले हैं

जिनमें न कोई रह सके वो घर भी मिले हैं

जिनको न रहा नामे-वफ़ा से कोई मतलब

बेरहम बदज़ुबान वो दिलबर भी मिले हैं

इस फै़सले में कोई तो साजि़श किसी की है

ज़ख़्मों के निशां जब मेरे दिल पर भी मिले हैं

आफ़त कोई आने को है मयखा़ने पे शायद

कमज़रफ़ों के हाथों में जो साग़र भी मिले हैं

राजन न हो मायूस उधर भी तो नज़र कर

प्यासे हैं बहुत ऐसे समंदर भी मिले हैं

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