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ग़ज़ल

इस सफ़र में वह भी छूटा

इश्क़ था कितना जुदा और थी वफ़ा कितनी अलग

मिल गई है जग हंसाई की सजा़ कितनी अलग

और यहां है ज़हर पीना सांस लेने की जगह

और वहां पेडों से आती है हवा कितनी अलग

उसने जब पोंछे मेरे आंखों से आंसू दिख गई

लग रही थी उसके हाथों में हिना कितनी अलग

मुद्दतों के बाद भी जलते हैं जिस्मो-जां मेरे

चश्मे- तर से उसकी बरसी थी घटा कितनी अलग

इस सफ़र में वह भी छूटा जिस पे था पूरा यकी़ं

और जो है साथ उसने दी दगा़ कितनी अलग

कोई राजन को बता दे फिर कहीं धोका ना हो

बात करता है कोई कितनी जुदा कितनी अलग


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