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ग़ज़ल

एहसास हो गया

वावबस्ता आज फिर हैं उसी रह गुज़र से हम

ड़रते नहीं ज़रा भी तो खो़फो़- ख़तर से हम

दुनिया हमीं को देख रही है बसद् खु़लूस

परचम उठाए इश्क़ का गुज़रे जिधर से हम

क्या शय है इश्क़ हमको भी एहसास हो गया

नाआशना थे लज़्ज़ते-दर्दे-जिगर से हम

बैठे हैं तरके-ख़्वाहिशेे-दुनिया किए हुए

मजबूर होकर हस्ती-ए-नामोतबर से हम

हमको भी जि़द है तूने जो छोड़ी ना अपनी ज़िद

सर फोड़ के उठेंगे तेरे संगे-दर से हम

राजन हम उनका जो़म मिटा देंगे खा़क में

वाकिफ़ नहीं थे आहे-लबे-बा-असर से हम


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