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ग़ज़ल

ज़माने में फ़जीहत होगी

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वक्त़ गर साथ तो कि़ स्मत की इनायत होगी

वरना हर सम्त ज़माने में फ़जीहत होगी

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जिसके पिंदार में हर वक्त़़ ही दौलत होगी

कब भला उसके दिल-ओ-जां में मुहब्बत होगी

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तुझको मालूम नहीं जाने-जिगर जाने-हया

गुल से भी छू लूं तेरे लब तो क़यामत होगी

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जो भी जीवन में किसी ठौर तलक पहुंचा है

उसकी फि़ तरत में ज़रूरी ही शराफ़त होगी

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इतना बढ आए हैं अब लौटना मुमकिन कैसा

यह क़दम बोसी- ए- मंजि़ ल की हिमाक़त होगी

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जिसकी फि़ तरत में भलाई का बड़ा जज़्बा हो

उससे दुनिया की हर शै को मोहब्बत होगी

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दिल पर नफ़रत का धुआं जमने नहीं देना तुम

वरना आपस के इरादों में अदावत होगी

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इश़्क करती है जो सब भूल के मुझसे राजन

उसके हाथों में मेरे दिल की हुकू़मत होगी

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