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ग़ज़ल

ज़मीं पर बारिश

झूमके गिरती है गिरने दो ज़मीं पर बारिश

काश हो जाए जहां प्यास वहीं पर बारिश

बच्चे काग़ज़ की चले आते हैं कश्ती लेकर

आब से भर दे जो गड्ढों को कहीं पर बारिश

बूंदे सावन की जलाती है बदन रह-रह कर

जब बरसती है किसी शोख़ हंसीं पर बारिश

मुझको अब प्यासा अगर छोड़ा तो मैं रो दूंगा

फिर बला से मेरी हो जाए कहीं पर बारिश

आग में पकने को रखे ही थे मिट्टी के ज़रूफ़

हाय कि़स्मत की हुयी ख़ूब वहीं पर बारिश

यह करिश्मा भी किसी रोज़ तो होगा राजन

उसकी हां पर भी हो, हो और नहीं पर बारिश


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