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ग़ज़ल

जो बे- अदब हो

रोती है ख़ू के अश्क ये अखियां में क्या करूं

बहका रही हैं ख़्वाबों की परियां मैं क्या करूं

शोलों की थी तलाश शरर भी नहीं मिला

रिश्तों का सर्द सर्द बयाबां मैं क्या करूं

तहजी़ब का लिबास सदा मुझ पे सजा है

जो बे- अदब हो चाक गिरेबां में क्या करूं

सारी जफा़एं उनकी तो दुनिया छुपा गई

मेरी वफा़एं हो गयीं उरियां मैं क्या करूं

सर को झुका के रख दिया जा़लिम के सामने

क़ातिल का हाथ होता है लरज़ां मैं क्या करूं

राजन किसी की शान में गु़स्ताखी़ हो न जाए

वह खु़द अमादा हो तो मेरी जां मैं क्या करूं


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