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ग़ज़ल

ठिकाना कहीं नहीं

रातों मेँ जब हुआ है ठिकाना कहीं नहीं

साया था मेरे साथ मगर हमनशीं नहीँ

जिसको वफ़ा के नाम से भी होना वास्ता

वो हुस्न ऐतबार के क़ाबिल नहीं नहीं

तै कर रहा हूँ मंज़िले-दुश्वार ग़म के साथ

अब रहनवर्द कोई मेरा हमनशीं नहीं

जब मैकदे हैं बंद तो दैरो-हरम की राह

तै हो सकेगी मुझसे तो राजन नहीं नहीं

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