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शेर

तय था बिछड़ना


“यह तय था बिछड़ना पर ऐसी भी थी क्या उज्लत,

दो चार क़दम चलता कह देता ग़ज़ल मैं भी”

— चित्रेन्द्र स्वरूप राजन

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