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ग़ज़ल

फिर चले जाना

मैं अपनी आंख के आंसूं छुपालूं

फिर चले जाना

ये कोशिश कुछ घड़ी तो आज़मालूं

फिर चले जाना अभी तक तो बहुत अफ़सुर्दगी में वक्त़ गुज़रा है

जो तुम चाहो तो मैं अब मुस्कुरालूं

फिर जानायह पत्थर का नगर है कब किसे अपना समझता है ज़रा इसको खरी-खोटी सुनालूं फिर चले जाना

जिन्हें इतना यकीं था टूट जाऊंगा बिना उनके

उन्हें मैं अपनी सूरत को दिखालूं

फिर चले

जानामुझे सू-ए-फ़लक परवाज़ करनी है मगर

पहले मैं अपने इन परों को आज़मालूं

फिर चले जाना

जहां से लोग गुज़रेंगे यक़ीनन जान लो राजन

मैं उन रास्तों में नक़्शे-पा बना लूं फिर चले जाना

राजन

अफ़सुर्दगी -दुःख

सू-ए-फ़लक- गगन की ओर

परवाज़ -उड़ान

नक़्शे पा- पदचिन्ह

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