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ग़ज़ल

मुझको गर छूले कोई

आंख मिलते ही मेरी सोच में ढल जाएगा

संग भी होगा वह गर पल में पिघल जाएगा

आज रुकता है तो ख़ातिर ज़रा जमकर करना

वरना इक रोज़ वो चुपचाप निकल जाएगा

काली रातों को अभी धूम मचा लेने दो

सुबह खु़र्शीद निकलते ही निगल जाएगा

इस क़दर दर्द के अंगार भरे हैं मुझ में

मुझको गर छूले कोई छूते ही जल जाएगा

सामने से मुझे हट जाने दो, दो दिन के लिए

सबके पहचान का अंदाज़ बदल जाएगा

आप एकदम से जो राजन के मुका़बिल आए

अब तो कहता हुआ वो शोख़ ग़ज़ल जाएगा

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