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ग़ज़ल

मुझको बिछड़ने का है मलाल

वह मुझको भूल गया उसको है कमाल बहुत

उसी से मुझको बिछड़ने का है मलाल बहुत

मैं अपना सर न झुकाता तो और क्या करता

वह मुझसे कर रहा था सीधे से सवाल बहुत

नए जमाने की कोंपल हैं दो दुआ उनको

ये बच्चे कर रहे हैं आजकल धमाल बहुत

ये सच है उसकी मैं रफ़्तार ही से हारा हूं

मैं पीछे रह गया थी तेज़ उसकी चाल बहुत

किसी की राह देखती है आज भी लड़की

कैलेंडरों से निकलते गए हैं साल बहुत

अकेले आ के वो राजन को कै़द क्या करता

इसीलिए तो वो लाया था अबके जाल बहुत

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