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ग़ज़ल

मैकदे में मय परस्ती

ज़िंदगानी में वजुज़ यादे-खुदा कुछ भी नहीं

ख्व़ाबे-रंगी है जहां ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

बादाख़्वारी काम आ सकती नहीं इंसान के

मैकदे में मय परस्ती के सिवा कुछ भी नहीं

मौज थी वह या कि तूफा़ं या लहर थी या भंवर

याद है डूबा था मैं इसके सिवा कुछ भी नहीं

एक ग़लत उठा था राहे- इश्क़ में मेरा क़दम

तब से मेरे पास है ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

शायरी ने ज़िंदगी करना बसर सिखला दिया

कौन कहता है कि “राजन” को मिला कुछ भी नहीं


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