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ग़ज़ल

रात भर तक तो साथ-साथ चलो

लम्हा भर तक तो साथ-चलो

रह-गुज़र तक तो साथ-साथ चलो

मेरी कि़स्मत इलाज हो कि ना हो

चारागर तक तो साथ-साथ चलो

ज़ुल्मते-शब का दम जहां टूटे

उस सहर तक तो साथ-साथ चलो

फिर दमे-सुबह आपकी मर्जी़

रात भर तक तो साथ-साथ चलो

अगले जन्मों में देखा जाएगा

इस सफ़र तक तो साथ-साथ चलो

जिस जगह साथ छूटा राजन का

उस डगर तक तो साथ-साथ चलो

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