Categories
ग़ज़ल

वो मयख़ाना हो गया

दिल अपना तेरी बात से शर्मिंदा हो गया

सब लोग कह रहे हैं कि तू कैसा हो गया

खुलकर कही जो बात तो तेवर बदल गए

सच बात का नतीजा बुरा जैसा हो गया

साक़ी-ए-बददिमाग़ हमें यां से मत उठा

बैठे हैं हम जहां भी वो मयख़ाना हो गया

फिर लौट के आया हूं मैं अपनों के शह्र में

हाथों में संग देखे हुए अर्सा हो गया

मुझ पर सदा ही रहम है परवरदिगार का

जिस से मिला हूं खुल के वही अपना हो गया

राजन मैं उसकी बज़्म में शामिल हुआ मगर

तनहा जो खु़द को पाया तो अफ़सुर्दा हो गया

Latest posts by चित्रेन्द्र स्वरूप राजन (see all)