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ग़ज़ल

हारा है जो दौड़ो के

यादों की बस्ती में या वीरानों में

ढूंढना गर उसको, ढूंढो दीवानों में

झुंड परिंदों का अब इतना स्याना है

पढ़ लेता है क्या लिखा है दानों में

फूलों से सब तितली दूर भगानी हैं

लिखा है संदेशा यह तूफ़ानों में

कछुआ क्यों ना यार पर हो जाए कु़र्बा

हारा है जो दौड़ो के मैदानों में

वह जाने कैसा जीवन हो जाएगा

आया है जो रहने को अनजानों में

राजन यह है नए कहन की ग़ज़ल तेरी

पा जाएगी की जगह नए दीवानों में

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